हिमाचल सरकार ने हाईकोर्ट में भरोसा दिया है कि वो हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स से लैंड रेवेन्यू यानी भू-राजस्व की वसूली दायर मामलों में याचिकाकर्ता कंपनियों के खिलाफ फिलहाल कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करेगी। प्रदेश सरकार ने इन परियोजनाओं के औसत बाजार मूल्य के तय प्रतिशत के रूप में गणना किए गए सालाना भू-राजस्व को वसूलने के आदेश जारी किए हैं। प्रदेश सरकार के इस आदेश के खिलाफ हाईकोर्ट में विभिन्न याचिकाएं दाखिल की गई हैं। हाईकोर्ट के न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजन शर्मा की खंडपीठ में इस मामले की सुनवाई हो रही है। खंडपीठ ने सरकार के इस आश्वासन के बाद NHPC, NTPC, SJVN और BBMB की याचिकाओं पर अगली सुनवाई 28 मई को निर्धारित करने के आदेश जारी किए हैं।
मामले में हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के राजस्व सचिव सहित ऊर्जा निदेशक को नोटिस जारी किया था। प्रार्थियों का कहना है कि, राज्य सरकार के पास उक्त राजस्व वसूलने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। याचिका के अनुसार राज्य सरकार ने 'हिमाचल प्रदेश भू-राजस्व (विशेष मूल्यांकन) संशोधन नियम, 2025' अधिसूचित किए हैं। इसमें हिमाचल प्रदेश भू-राजस्व (विशेष मूल्यांकन) नियम, 1986' के नियम 10 को बदला गया है। साथ ही नियम 15 में संशोधन किया गया है, ताकि प्रोजेक्ट के औसत बाज़ार मूल्य के आधार पर विशेष भू-राजस्व मूल्यांकन का प्रावधान किया जा सके।
इसके बाद, 1 दिसंबर 2025 को प्रदेश सरकार ने एक अधिसूचना के माध्यम से प्रदेश के भीतर चल रहे जलविद्युत प्रोजेक्टों के संबंध में, प्रोजेक्ट के औसत बाज़ार मूल्य की दो फीसदी की दर पर भू-राजस्व निर्धारित करने को मंजूरी दी। सरकारी अधिसूचना में कहा गया है कि यह लेवी 1 जनवरी 2026 से देय होगी। इसके बाद, 10 और 18 दिसंबर को, सेटलमेंट अधिकारी और राजस्व अधिकारी (मूल्यांकन प्रभारी), शिमला मंडल ने इस संदर्भ में अधिसूचनाएं जारी कीं, जिनमें प्रोजेक्टों के औसत बाजार मूल्य को प्रकाशित किया गया। साथ ही 1 जनवरी 2026 से 'वार्षिक भू-राजस्व' लगाने का प्रस्ताव रखा गया।
इसके अलावा निर्धारित समय सीमा के भीतर प्रभावित व्यक्तियों और संस्थाओं से आपत्तियां भी आमंत्रित की गईं। सभी परियोजनाओं ने विस्तृत आपत्तियां दायर कीं, जिसमें प्रस्तावित लेवी को विधायी सक्षमता की कमी, मूल अधिनियम के अधिकार क्षेत्र से बाहर होने, मनमानी, संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन और कानूनी अधिकार के अभाव के आधार पर चुनौती दी गई थी। राज्य सरकार ने 6 जनवरी को याचिकाकर्ताओं और जलविद्युत प्रोजेक्टों के अन्य मालिकों को एक पत्र जारी किया, जिसमें उनसे निर्धारित की जाने वाली दर की मात्रा पर 20 जनवरी 2026 तक अपनी टिप्पणियां प्रस्तुत करने के लिए कहा गया।
इसके अलावा निर्धारित समय सीमा के भीतर प्रभावित व्यक्तियों और संस्थाओं से आपत्तियां भी आमंत्रित की गईं। सभी परियोजनाओं ने विस्तृत आपत्तियां दायर कीं, जिसमें प्रस्तावित लेवी को विधायी सक्षमता की कमी, मूल अधिनियम के अधिकार क्षेत्र से बाहर होने, मनमानी, संवैधानिक प्रावधानों के उल्लंघन और कानूनी अधिकार के अभाव के आधार पर चुनौती दी गई थी। राज्य सरकार ने 6 जनवरी को याचिकाकर्ताओं और जलविद्युत प्रोजेक्टों के अन्य मालिकों को एक पत्र जारी किया, जिसमें उनसे निर्धारित की जाने वाली दर की मात्रा पर 20 जनवरी 2026 तक अपनी टिप्पणियां प्रस्तुत करने के लिए कहा गया।
प्रार्थियों ने राज्य सरकार की तरफ से 6 जनवरी 2026 के उक्त पत्र को लेकर जवाब दिया और इस बात को दोहराया कि प्रस्तावित लेवी असंवैधानिक है। इसके अलावा ये भी बताया गया कि इस विवादित लेवी के कारण टैरिफ में काफी वृद्धि होगी, जिससे परियोजनाएं कम प्रतिस्पर्धी हो जाएंगी। इसके बाद 2 और 3 फरवरी को राज्य सरकार ने विवादित अधिसूचना जारी की, जिसे 5 फरवरी 2026 को राजपत्र में प्रकाशित किया गया। इसके तहत परियोजना के औसत बाजार मूल्य के आधार पर एक स्लैब-आधारित दर लागू की गई। उक्त विवादित अधिसूचना में, भू-राजस्व लेवी की दर परियोजना के औसत बाजार मूल्य के एक से 2 फीसदी के बीच निर्धारित की गई है।
विवादित अधिसूचना में यह भी प्रावधान किया गया कि उक्त लेवी 2 फरवरी 2026 से प्रभावी होगी और इसका भुगतान प्रतिवर्ष 2 समान किस्तों में किया जाएगा। पहली किस्त 1 अप्रैल से 30 अप्रैल के बीच और दूसरी किस्त 1 अक्टूबर से 31 अक्टूबर के बीच देनी होगी। प्रार्थियों ने मांग की है 'हिमाचल प्रदेश भू-राजस्व (विशेष निर्धारण) संशोधन नियम, 2025' को रद्द और निरस्त किया जाए। यह 'हिमाचल प्रदेश भू-राजस्व (विशेष निर्धारण) नियम, 1986' के नियम 10 को प्रतिस्थापित करता है और नियम 15 में संशोधन करता है।
इसमें 1 दिसंबर 2025, 10 दिसंबर 2025, 18 दिसंबर 2025, 2 फरवरी 2026 और 3 फरवरी 2026 की अधिसूचनाओं एवं विवादित हिमाचल प्रदेश भू-राजस्व (विशेष मूल्यांकन) संशोधन नियम, 2025 के संबंध में या उसके परिणामस्वरूप जारी किए गए सभी बाद के नोटिस और पत्राचार को खारिज करने की मांग भी की गई है। प्रार्थियों ने राज्य सरकार को विवादित हिमाचल प्रदेश भू-राजस्व (विशेष मूल्यांकन) संशोधन नियम, 2025 और उसके बाद की अधिसूचनाओं के तहत वार्षिक भू-राजस्व के विवादित लेवी (कर) की वसूली करने से रोकने और अंतरिम रूप से अगले आदेश तक, विवादित संशोधन नियमों और अधिसूचनाओं के तहत वार्षिक भू-राजस्व के विवादित लेवी के कार्यान्वयन, प्रवर्तन और वसूली के संबंध में यथास्थिति बनाए रखने की मांग की है। इस पर सरकार ने भरोसा दिया है कि प्रोजेक्ट्स के खिलाफ कोई दंडात्मक एक्शन नहीं लिया जाएगा।
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